चल रहे है वो रहा काँटों की,
न जाने फूल की क्यों छोड़ दी?
बर्दाश्त नहीं है चुभन जरा भी पर
ना जाने क्यों जिन्दजी उधर ही मोड़ दी
मालूम है उनको की है वो फूल से प्यारे मगर
न जाने क्यों कली से आगे की डगर उन्होंने छोड़ दी
मालूम है उन को की कली ही फूल बनती है मगर
उन्होंने तो कली ही आधी छोड़ दी
लगता है दिख गया है उन को कहीं
वह बेगाना पतझड़ का मोसम कहीं
उसी डर से तो ना उन्होंने ये जिन्दजी मोड़ ली
क्या समझते है वो कली के योवन को ही जीवन
क्यों पुष्प के रूप का अंदाजा नहीं है
लगता है मालूम नहीं उन्हें टूटी कली का अतीत
कैसे मुरझाती है वो चन्द दिनों के बीच
कभी तो समझना पड़ेगा उनको
अपने जीवन की इस डगर को
रोकना होगा पोधे से टूटती
अपने जीवन की इस कली को
समझना होगा अब तो उन्हें इस सत्य को
की पोधा ही बना सकता है पुष्प कली को
पोधा ही बना सकता........................
गुरुवार, 25 मार्च 2010
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