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गुरुवार, 25 मार्च 2010

समझो जीवन रूपी कली को

चल रहे है वो रहा काँटों की,
न जाने फूल की क्यों छोड़ दी?
बर्दाश्त नहीं है चुभन जरा भी पर
ना जाने क्यों जिन्दजी उधर ही मोड़ दी
मालूम है उनको की है वो फूल से प्यारे मगर
न जाने क्यों कली से आगे की डगर उन्होंने छोड़ दी
मालूम है उन को की कली ही फूल बनती है मगर
उन्होंने तो कली ही आधी छोड़ दी
लगता है दिख गया है उन को कहीं
वह बेगाना पतझड़ का मोसम कहीं
उसी डर से तो ना उन्होंने ये जिन्दजी मोड़ ली
क्या समझते है वो कली के योवन को ही जीवन
क्यों पुष्प के रूप का अंदाजा नहीं है
लगता है मालूम नहीं उन्हें टूटी कली का अतीत
कैसे मुरझाती है वो चन्द दिनों के बीच
कभी तो समझना पड़ेगा उनको
अपने जीवन की इस डगर को
रोकना होगा पोधे से टूटती
अपने जीवन की इस कली को
समझना होगा अब तो उन्हें इस सत्य को
की पोधा ही बना सकता है पुष्प कली को
पोधा ही बना सकता........................




शनिवार, 16 जनवरी 2010

अब ना हम आजाद है

जन्म लिया था आजादी में पर अब ना हम आजाद है

जात-पात की बेडियों में कैद हुए बर्बाद है

आये थे जब हम दुनिया में तो कुछ वर्षो तक आजाद थे

होश सम्भाला जैसे ही हमने देखा ज़ात-पात में कैद है

छोटे-छोटे थे जब तक हम हम को कुछ न मालूम था

साथ-साथ हम रहते थे और बहुत धूम मचाते थे

जात-पात थी पता नहीं हम सब एक कहाते थे

बड़े हो गये शिखा पा ली जब हम को है ज्ञात हुआ

जात-पात जैसे शब्दों का ज्ञान हमे है प्राप्त हुआ

ज्ञान दिया था समझाने हेतु हम कुछ और समझ बैठे

जात-पात का भेद मिटा ना और हम बैरी बन बैठे

हमारी भेद-भाव की इस नीती को दुश्मन ने है पहचान लिया

जात-पात के नाम पर देखो कैसा उस ने है वार किया

अब भी समय है समझ जाये वरना फिर पछतायेंगे

जात-पात की इस बेडियों में यू ही जकड़े रह जायेंगे

रंग-रूप का भेद भुलाकर हम सब एक हो जाये

जाती-धर्म को छोड़ परे हम सब भारतीय हो जाये

सवाल उठाये जो जात-पात का अब उसका खात्मा हम कर डाले

अखंड भारत का सपना अपना अब हम पूरा कर डाले