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मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

डराते है रिश्ते



अब तो डर लगने लगा है हम को इन रिश्तो से

बहुत डराने लगे है ये रिश्ते

कभी थे अपने ये रिश्ते अब पराये से हो गये है

कभी धूप में छाव थे रिश्ते अब तो तपन होने लगे है

कभी अमूल्य थे रिश्ते अब तो बेमोल बिकने लगे है

कभी पड़ती थी जरूरत हम को रिश्तो की

अब तो ये वंदिश लगने लगे है

कभी फूल से नाजुक होते थे रिश्ते

अब तो पतझड़ से टूटने लगे है

कभी होती थी चट्टान की मजबूती रिश्तो में

अब तो रेत के महल होने लगे है


अब तो डर लगने लगा है हम को इन रिश्तो से

बहुत डराने लगे है ये रिश्ते...........................