अब तो डर लगने लगा है हम को इन रिश्तो से
बहुत डराने लगे है ये रिश्ते
कभी थे अपने ये रिश्ते अब पराये से हो गये है
कभी धूप में छाव थे रिश्ते अब तो तपन होने लगे है
कभी अमूल्य थे रिश्ते अब तो बेमोल बिकने लगे है
कभी पड़ती थी जरूरत हम को रिश्तो की
अब तो ये वंदिश लगने लगे है
कभी फूल से नाजुक होते थे रिश्ते
अब तो पतझड़ से टूटने लगे है
कभी होती थी चट्टान की मजबूती रिश्तो में
अब तो रेत के महल होने लगे है
अब तो डर लगने लगा है हम को इन रिश्तो से
बहुत डराने लगे है ये रिश्ते...........................

